वट सावित्री और वट पूर्णिमा व्रत

वट सावित्री और वट पूर्णिमा व्रत | Vat Savitri Vrat

वट सावित्री और वट पूर्णिमा व्रत क्यों और कैसे मनाया जाता है? जानिए उत्तर और दक्षिण भारत के अमानता और पूर्णिमानता पंचांग के अनुसार इसमें क्या अंतर है और व्रत रखने की सही विधि क्या है।

सुहागन महिलाएं अपने पति और सास-ससुर की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए वट पूर्णिमा और वट सावित्री व्रत रखती हैं। हालांकि, भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे मनाने की तिथियों में थोड़ा अंतर होता है:

  • दक्षिण व पश्चिम भारत: महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारतीय राज्यों में महिलाएं इसे ज्येष्ठ माह की शुक्ल पूर्णिमा को मानती हैं, जिसे वट पूर्णिमा व्रत कहा जाता है।
  • उत्तर भारत: पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में यह व्रत 15 दिन पहले ही ज्येष्ठ मास की कृष्ण अमावस्या को वट सावित्री व्रत के रूप में मनाया जाता है।

अमानता और पूर्णिमानता पंचांग में क्या अंतर है?

भारत में हिंदुओं के बीच दो प्रकार के मुख्य पंचांग (कैलेंडर) अधिक प्रसिद्ध हैं। अधिकतर त्योहार इन्हीं दो पंचांगों के आधार पर तय किए जाते हैं:

  • पूर्णिमानता पंचांग (Purnimanta Calendar): यह उत्तर भारत में लोकप्रिय है, जिसका महीना पूर्णिमा के बाद बदलता है। इसके अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाया जाता है।
  • अमानता पंचांग (Amanta Calendar): यह दक्षिण और पश्चिम भारत में माना जाता है, जिसका महीना अमावस्या के बाद शुरू होता है। इसके अनुसार यह व्रत ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है।

नोट: वैसे तो दोनों ही कैलेंडरों में अधिकांश व्रत और त्योहार एक ही दिन पड़ते हैं, लेकिन कुछ त्योहारों में दिनों का यह अंतर देखने को मिलता है। हालांकि, दोनों ही पंचांगों के अनुसार व्रत का महत्व, नियम और इसके पीछे की पौराणिक कथा (सावित्री और सत्यवान की कहानी) बिल्कुल समान है।

वट सावित्री व्रत कैसे रखें? (पूजा और उपवास के नियम)

सुहागिन महिलाओं के बीच वट सावित्री व्रत का महत्व प्रसिद्ध करवा चौथ व्रत के ही समान है। इस व्रत को रखने के कुछ पारंपरिक नियम इस प्रकार हैं:

  • तीन दिनों का अनुष्ठान: कई रूढ़िवादी परंपराओं में स्त्रियाँ इस अनुष्ठान के दौरान तीन दिन का उपवास रखती हैं।
  • सुलभ व्रत विधि: यदि तीन दिन तक लगातार भूखे रहना संभव न हो, तो महिलाएं इस आसान तरीके से व्रत का पालन कर सकती हैं:
  1. पहला दिन: रात को सात्विक भोजन कर लिया जाता है।
  2. दूसरा दिन: इस दिन केवल फलाहार (Fruits) किया जाता है।
  3. तीसरा दिन (मुख्य व्रत): इस दिन पूर्ण रूप से निर्जला या निराहार व्रत का पालन किया जाता है और वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा की जाती है।

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