जगन्नाथ स्नान यात्रा: Jagannath Snan Yatra
जगन्नाथ रथ यात्रा से पहले क्यों होती है ‘स्नान यात्रा’? जानिए क्यों 108 घड़ों के ठंडे जल से स्नान के बाद बीमार पड़ जाते हैं भगवान जगन्नाथ और क्या है 15 दिनों के ‘अनसर’ काल का रहस्य।
विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा (Jagannath Rath Yatra) और बहुदा यात्रा के उत्सव से भी पहले, पुरी धाम में एक और बेहद रोचक और अलौकिक अनुष्ठान होता है, जिसे ‘स्नान यात्रा’ (Snana Yatra) कहा जाता है।
दरअसल, महाप्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा की तैयारियां इस मुख्य दिन से बहुत पहले ही शुरू हो जाती हैं। रथयात्रा से लगभग 18 दिन पहले, ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा को औपचारिक रूप से पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। इसी वजह से इस तिथि को स्नान पूर्णिमा भी कहते हैं।
108 कलशों से शाही स्नान की परंपरा
स्नान यात्रा के मुख्य दिन, जगन्नाथ मंदिर के प्रांगण में एक अद्भुत दृश्य होता है। इस दिन तीनों विग्रहों को गर्भगृह से बाहर लाकर स्नान वेदी पर विराजमान किया जाता है। इसके बाद:
- मंदिर के परिसर में स्थित एक विशेष उत्तरी कुएं (Suna Kua) से शुद्ध और सुगंधित जल निकाला जाता है।
- इस पवित्र जल के 108 बर्तनों (कलशों) से भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और देवी सुभद्रा का शाही स्नान कराया जाता है।
‘अनसर’ काल: जब 15 दिनों के लिए बीमार होते हैं महाप्रभु
शाही स्नान के बाद की यह परंपरा बेहद अनोखी है। मान्यता है कि ज्येष्ठ मास की गर्मी में अचानक इतने ठंडे जल से स्नान करने के कारण भगवान बीमार (ज्वर से पीड़ित) पड़ जाते हैं।
- भक्तों के लिए कपाट बंद: बीमार होने के कारण भगवान अगले 15 दिनों तक एकांतवास में चले जाते हैं। इस दौरान मंदिर के कपाट आम भक्तों के लिए पूरी तरह बंद रहते हैं और भगवान को केवल विशेष काढ़ा और औषधियां अर्पित की जाती हैं।
- अनसर उत्सव (Anasara): भगवान के इस 15 दिनों के एकांतवास की अवधि को ‘अनसर काल’ के रूप में जाना जाता है।
अनसर के दौरान भगवान अलारनाथ के दर्शन का महत्व
जब पुरी मंदिर में महाप्रभु का एकांतवास चल रहा होता है, तब भक्त उनके दर्शन के लिए व्याकुल हो उठते हैं। इस अवधि के दौरान, वैकल्पिक रूप से भक्त पुरी से करीब 25 किलोमीटर दूर ब्रह्मगिरि में स्थित भगवान अलारनाथ (Lord Alarnath) के दर्शन करते हैं। मान्यता है कि अनसर के दिनों में भगवान अलारनाथ के दर्शन करने से साक्षात जगन्नाथ जी के दर्शन जितना ही पुण्य मिलता है।
नव यौवन दर्शन और नेत्रोत्सव: एकांतवास की समाप्ति
15 दिनों के सफल उपचार और विश्राम के बाद, महाप्रभु पूरी तरह स्वस्थ होकर वापस लौटते हैं और अपने भक्तों को दर्शन देते हैं।
- नव यौवन दर्शन (Navayoubana Darshan): बीमारी से ठीक होने के बाद जब भगवान पहली बार भक्तों के सामने आते हैं, तो उनके इस अलौकिक रूप को ‘नव यौवन दर्शन’ कहा जाता है।
- नेत्रोत्सव (Netrotsava): इसी दिन भगवान के विग्रहों की आँखों को अंतिम रूप से रंगा जाता है, जिसे ‘नेत्रोत्सव’ अनुष्ठान कहते हैं।
भव्य रथ यात्रा की शुरुआत: नेत्रोत्सव के ठीक अगले ही दिन, पुरी धाम में वह ऐतिहासिक और भव्य जगन्नाथ रथ यात्रा उत्सव शुरू होता है, जिसका इंतजार पूरी दुनिया के सनातनी साल भर करते हैं!
जगन्नाथ स्नान यात्रा से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: जगन्नाथ स्नान यात्रा कब मनाई जाती है?
उत्तर: महाप्रभु जगन्नाथ की स्नान यात्रा हर साल ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इसी कारण इस दिन को ‘स्नान पूर्णिमा’ भी कहा जाता है।
प्रश्न 2: स्नान यात्रा के दिन भगवान को कितने घड़ों से स्नान कराया जाता है?
उत्तर: इस पावन दिन पर भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को मंदिर के पवित्र उत्तरी कुएं (सुना कुआं) से निकाले गए 108 कलशों/घड़ों के शुद्ध जल से शाही स्नान कराया जाता है।
प्रश्न 3: भगवान जगन्नाथ के बीमार होने की अवधि को क्या कहते हैं और यह कितने दिनों की होती है?
उत्तर: ठंडे जल से स्नान करने के बाद भगवान के बीमार होने की इस 15 दिनों की अवधि को ‘अनसर काल’ (Anasara) कहा जाता है। इस दौरान भक्तों के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं।
प्रश्न 4: अनसर काल के दौरान भगवान जगन्नाथ के दर्शन कहाँ किए जा सकते हैं?
उत्तर: जब पुरी मंदिर में ‘अनसर’ के कारण महाप्रभु एकांतवास में होते हैं, तब भक्त उनके विकल्प के रूप में पुरी से लगभग 25 किमी दूर ब्रह्मगिरि में स्थित ‘भगवान अलारनाथ’ के दर्शन करते हैं।

