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वट सावित्री व्रत कथा: जानिए यमराज के उन 3 चमत्कारी वरदानों की पावन कहानी

वट सावित्री व्रत कथा

👤 Trishakti Spiritual Editorial Team

📅 Published: June 29, 2026

वट सावित्री व्रत कथा— (Vat Savitri Vrat Katha)

राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री का जन्म

भद्र देश के एक धर्मात्मा राजा थे, जिनका नाम अश्वपति था। राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। यह कठिन अनुष्ठान लगातार 18 वर्षों तक चलता रहा।

इसके बाद सावित्री देवी ने प्रकट होकर राजा को वरदान दिया कि उन्हें एक अत्यंत तेजस्वी कन्या प्राप्त होगी। सावित्री देवी की कृपा और आशीर्वाद से जन्म लेने के कारण इस कन्या का नाम सावित्री रखा गया।

सत्यवान का वरण और नारद मुनि की भविष्यवाणी

सावित्री जब बड़ी हुई, तो वह बेहद रूपवान और गुणवान थीं। योग्य वर न मिलने के कारण राजा अश्वपति चिंतित रहने लगे और उन्होंने सावित्री को स्वयं अपने लिए वर तलाशने भेजा।

तपोवन में भटकते हुए सावित्री की मुलाकात सत्यवान से हुई। सत्यवान साल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे, जिनका राज्य शत्रुओं ने छीन लिया था और वे वन में रह रहे थे। सत्यवान को देखते ही सावित्री ने उन्हें अपने पति के रूप में चुन लिया।

जब ऋषिराज नारद को इस बात का पता चला, तो वे तुरंत राजा अश्वपति के पास पहुंचे और बोले—

“हे राजन! सत्यवान सर्वगुण संपन्न, धर्मात्मा और बलवान तो हैं, परंतु वे अल्पायु हैं। आज से ठीक एक वर्ष के बाद उनकी मृत्यु निश्चित है।”

नारद मुनि की बात सुनकर राजा घोर चिंता में डूब गए। उन्होंने सावित्री को समझाया कि वह किसी अन्य को अपना जीवनसाथी चुन लें। परंतु सावित्री अपने फैसले पर अडिग रहीं और बोलीं—

“पिताजी, आर्य कन्याएं अपने पति का वरण एक ही बार करती हैं। राजा एक बार आज्ञा देता है, पंडित एक बार प्रतिज्ञा करते हैं और कन्यादान भी एक ही बार होता है। मैं सत्यवान से ही विवाह करूंगी।”

अंततः राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया।

जब यमराज हरने आए सत्यवान के प्राण

विवाह के बाद सावित्री अपने ससुराल पहुंचकर सास-ससुर और पति की सेवा में लग गईं। नारद मुनि द्वारा बताई गई सत्यवान की मृत्यु की तिथि जैसे-जैसे निकट आने लगी, सावित्री की व्याकुलता बढ़ती गई। उन्होंने मृत्यु की तिथि से तीन दिन पहले से ही कठिन उपवास (व्रत) शुरू कर दिया।

निश्चित तिथि पर सत्यवान हर दिन की तरह जंगल में लकड़ी काटने जाने लगे, तो सावित्री भी उनके साथ चल दीं। जंगल में लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान के सिर में असहज दर्द होने लगा। वे पेड़ से नीचे उतरे और सावित्री की गोद में अपना सिर रखकर लेट गए। सावित्री समझ गईं कि अंतिम समय आ गया है।

तभी वहां साक्षात यमराज प्रकट हुए और सत्यवान के प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे। सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ीं। यमराज ने उन्हें बहुत समझाया कि यह विधि का विधान है, परंतु सावित्री की निष्ठा और पतिपरायणता अडिग थी।

यमराज से मांगे तीन अद्भुत वरदान

सावित्री के साहस और कर्तव्यपरायणता को देखकर यमराज अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले— “हे देवी! तुम धन्य हो। सत्यवान के प्राणों के अतिरिक्त तुम मुझसे कोई भी तीन वरदान मांग सकती हो।”

सावित्री ने चतुराई और श्रद्धा से यमराज से ये तीन वरदान मांगे:

  • पहला वरदान: “मेरे वनवासी सास-ससुर अंधे हैं, उन्हें आप पुनः दिव्य ज्योति (आँखों की रोशनी) प्रदान करें।” (यमराज ने कहा- तथास्तु)
  • दूसरा वरदान: “हमारे ससुर का छीना हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए।” (यमराज ने कहा- ऐसा ही होगा, अब तुम लौट जाओ)
  • तीसरा वरदान: सावित्री ने यमराज से 100 संतानों (पुत्रों) की माता होने और अखंड सौभाग्य का वरदान मांग लिया। यमराज ने बिना सोचे-समझे इस पर भी तथास्तु कह दिया।

सावित्री की बुद्धिमानी और सत्यवान का पुनर्जन्म

तीसरा वरदान देने के बाद जब यमराज आगे बढ़े, तो सावित्री ने विनम्रतापूर्वक कहा—

“हे प्रभु! आपने मुझे सौ पुत्रों की माता होने का आशीर्वाद दिया है, परंतु एक पतिव्रता नारी के लिए अपने पति के बिना यह कैसे संभव है? अतः आपको अपने ही वरदान को पूरा करने के लिए मेरे पति के प्राण लौटाने होंगे।”

यमराज सावित्री की इस बुद्धिमानी और पतिभक्ति के आगे निरुत्तर हो गए। उन्होंने सहर्ष सत्यवान के प्राण छोड़ दिए और अंतर्ध्यान हो गए।

वट वृक्ष (बरगद) के पास वापसी और सुखद अंत

सावित्री तुरंत उसी वट वृक्ष (बरगद के पेड़) के पास वापस आईं, जहां उनके पति का मृत शरीर रखा था। वट वृक्ष की परिक्रमा करते ही सत्यवान जीवित हो उठे। जब दोनों अपने महल पहुंचे, तो देखा कि माता-पिता की आँखों की रोशनी वापस आ चुकी थी और उनका खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया था। इस प्रकार सावित्री और सत्यवान दीर्घकाल तक राजसुख भोगते रहे।

वट सावित्री व्रत का महत्व

  • संकटों का नाश: मान्यता है कि वट सावित्री का व्रत रखने और इस पावन कथा को सुनने से वैवाहिक जीवन पर आया बड़े से बड़ा संकट भी टल जाता है।
  • अखंड सौभाग्य की प्राप्ति: यह व्रत सुहागिनों को अखंड सौभाग्य और संतान सुख प्रदान करता है।
  • पूजा की शुरुआत: इस दिन व्रत की शुरुआत हमेशा अपने सास-ससुर के पैर छूकर और उनका पूजन करके ही करनी चाहिए, जैसा सावित्री ने किया था।

वट सावित्री व्रत से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

QuestionAnswer
प्रश्न 1: वट सावित्री व्रत में किस पेड़ की पूजा की जाती है?उत्तर: इस व्रत में मुख्य रूप से वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है।
प्रश्न 2: सावित्री ने यमराज से कितने वरदान मांगे थे?उत्तर: सावित्री ने अपनी बुद्धिमानी से यमराज से कुल 3 अद्भुत और कल्याणकारी वरदान मांगे थे।

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👤 लेखक

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