Tripura Sundari Ashtakam सनातन धर्म और तंत्र शास्त्र में दश महाविद्याओं का विशेष महत्व है। इनमें तीसरी महाविद्या माता षोडशी त्रिपुर सुन्दरी हैं। आदिगुरु शंकराचार्य जी द्वारा रचित “त्रिपुरसुंदरी अष्टक-स्तोत्रम” माता की कृपा पाने और जीवन से दरिद्रता व नकारात्मक शक्तियों को दूर करने का एक अमोघ उपाय है।
इस लेख में हम त्रिपुर सुन्दरी अष्टक के पाठ, इसके पीछे की पौराणिक कथा और इसके अद्भुत लाभों के बारे में जानेंगे।
त्रिपुर सुन्दरी अष्टक के पीछे की पौराणिक कथा (History)
प्रचलित लोककथा के अनुसार, एक बार आदिगुरु शंकराचार्य भिक्षाटन (भिक्षा मांगने) के समय एक अत्यंत गरीब ब्राह्मणी की रुग्णकुटीर (बीमार और जर्जर झोपड़ी) के द्वार पर पधारे। अपनी दयनीय और दरिद्र स्थिति में भी उस ब्राह्मणी ने परम श्रद्धा पूर्वक आचार्य जी को एक फल अर्पण किया।
ब्राह्मणी के इस निश्छल और आंतरिक सत्कार से आचार्य जी अत्यंत प्रसन्न हुए। उसकी दरिद्रता को तत्क्षण दूर करने (दारिद्र-मोचन) के लिए उन्होंने वहीं खड़े-खड़े इस अद्भुत त्रिपुराष्टक (Tripura Sundari Ashtakam) की रचना की और माता की स्तुति की।
विद्वानों का मत: कुछ विद्वानों के अनुसार, दारिद्र्य मुक्ति की इस घटना से जुड़ा एक अन्य स्तोत्र भी है, जिसका आरंभ “विल्वाटवी मध्य लशत सरोजे…” से होता है, जिसे कनकधारा स्तोत्र के संदर्भ में भी देखा जाता है।
त्रिपुर सुन्दरी अष्टक पाठ के लाभ (Benefits)
यद्यपि महाविद्याओं की साधना अत्यंत जटिल और तंत्र-विद्या पर आधारित होती है, लेकिन एक साधारण भक्त यदि पूर्ण विश्वास और भक्ति भाव से इस अष्टक-स्तोत्र का नियमित पाठ करता है, तो उसे निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
- तंत्र बाधाओं से रक्षा: दुष्ट तांत्रिकों द्वारा किए गए मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन और स्तम्भन आदि अभिचार कर्मों का प्रभाव निष्फल हो जाता है।
- दरिद्रता का नाश: माता की कृपा से भक्त के कर्म और मेहनत के अनुसार धन-दौलत कमाने के मार्ग खुलते हैं और समृद्धि आती है।
- मानसिक शांति: इसके नियमित पाठ से मन शांत होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
Tripura Sundari Ashtakam Lyrics)
॥ श्री त्रिपुरसुन्दरी अष्टक-स्तोत्रम ॥
कदंबवनचारिणीं मुनिकदम्बकादंविनीं,
नितंबजितभूधरां सुरनितंबिनीसेविताम्।
नवंबुरुहलोचनामभिनवांबुदश्यामलां,
त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये॥ 1 ॥
कदंबवनवासिनीं कनकवल्लकीधारिणीं,
महार्हमणिहारिणीं मुखसमुल्लसद्वारुणींम्।
दया विभव कारिणी विशद लोचनी चारिणी,
त्रिलोचन कुटुम्बिनी त्रिपुर सुंदरी माश्रये॥ 2 ॥
कदंबवनशालया कुचभरोल्लसन्मालया,
कुचोपमितशैलया गुरुकृपालसद्वेलया।
मदारुणकपोलया मधुरगीतवाचालया,
कयापि घननीलया कवचिता वयं लीलया॥ 3 ॥
कदंबवनमध्यगां कनकमंडलोपस्थितां,
षडंबरुहवासिनीं सततसिद्धसौदामिनीम्।
विडंवितजपारुचिं विकचचंद्रचूडामणिं,
त्रिलोचनकुटुंबिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये॥ 4 ॥
कुचांचितविपंचिकां कुटिलकुंतलालंकृतां,
कुशेशयनिवासिनीं कुटिलचित्तविद्वेषिणीम्।
मदारुणविलोचनां मनसिजारिसंमोहिनीं,
मतंगमुनिकन्यकां मधुरभाषिणीमाश्रये ॥ 5 ॥
स्मरेत्प्रथमपुष्प्णीं रुधिरबिन्दुनीलांबरां,
गृहीतमधुपत्रिकां मधुविघूर्णनेत्रांचलाम्।
घनस्तनभरोन्नतां गलतचूलिकां श्यामलां,
त्रिलोचनकुटंबिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये॥ 6 ॥
सकुंकुमविलेपनामलकचुंबिकस्तूरिकां ,
समंदहसितेक्षणां सशरचापपाशांकुशाम्।
अशेष जनमोहिनी मरूण माल्य भुषाम्बरा,
जपाकुशुम भाशुरां जपविधौ स्मराम्यम्बिकाम॥ 7 ॥
पुरम्दरपुरंध्रिकां चिकुरबंधसैरंध्रिकां,
पितामहपतिव्रतां पटुपटीरचर्चारताम्।
मुकुंदरमणीं मणिलसदलंक्रियाकारिणीं,
भजामि भुवनांबिकां सुरवधूटिकाचेटिकाम्॥ 8 ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छंकराचार्य विरचितं त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रं संपूर्णम् ॥
श्री त्रिपुर सुन्दरी अष्टक न केवल काव्य की दृष्टि से अत्यंत सुंदर है, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी यह एक शक्तिशाली कवच है। यदि आप जीवन में आर्थिक तंगी या किसी भी प्रकार के अज्ञात भय से जूझ रहे हैं, तो शुक्रवार के दिन से इस अष्टक का पाठ शुरू कर सकते हैं। माता त्रिपुर सुन्दरी आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करेंगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. त्रिपुर सुन्दरी अष्टक का पाठ कब करना चाहिए?
Ans: इस स्तोत्र का पाठ सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके धूप-दीप जलाकर करना सबसे उत्तम माना जाता है। शुक्रवार का दिन माता की पूजा के लिए विशेष है।
Q2. क्या इस स्तोत्र के पाठ के लिए दीक्षा की आवश्यकता है?
Ans: तंत्र साधना के लिए दीक्षा जरूरी है, लेकिन आदि शंकराचार्य विरचित इस अष्टक का भक्ति भाव से पाठ (स्तोत्र पाठ) कोई भी भक्त कर सकता है, इसके लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है।
